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गोरखपुर यूनिवर्सिटी में लिखी जा रही है सपा-बसपा या यादव-दलित के मिलन की स्क्रिप्ट!

गोरखपुर यूनिवर्सिटी

आयुष द्विवेदी/राकेश मिश्रा
गोरखपुर: देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका किसी से छुपी नहीं है। अब तो प्रदेश के पूर्वांचल का महत्व भी बहुत बढ़ गया है। इस क्षेत्र की महत्ता को इसी बात से समझा जा सकता है कि वर्तमान में देश के प्रधान मंत्री और सूबे के मुखिया दोनों पूर्वांचल का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। यहाँ तक की वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दो जगहों से लोक सभा का चुनाव जीतने के बाद आध्यात्मिक नगरी वाराणसी का ही प्रतिनिधत्व करना उचित समझा।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विकास के दौड़ में बुरी तरह से पिछड़ा हुआ पूर्वांचल राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक है। यही कारण है किस क्षेत्र ने इस देश के साथ-साथ इस राज्य को अनगिनत नेता दिए हैं जिन्होंने आगे चल कर देश-प्रदेश की बागडोर बखूबी संभाली। यूँ तो यदि किसी को देश या प्रदेश में सरकार बनानी हो तो उसे हर क्षेत्र, हर विधानसभा और हर लोक सभा में जितना जरुरी है।

लेकिन बीते तीन दशकों में जिस तरह से राजनीति ने बदलाव के कई करवट लिए उससे एक बात निकल कर तो सामने आती ही है कि इस समय जिसने पूर्वांचल जीत लिया उसने आधी बाजी तो जीत ही ली। यही कारण है कि भाजपा ने इस क्षेत्र को अपनी हिंदुत्व की राजनीति के एक प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया। और उसमे पार्टी काफी हद तक सफल भी रही।

पूर्वांचल में यूँ तो कई बड़े शहर हैं लेकिन गोरक्षपीठ की महत्ता के नाते गोरखपुर का स्थान ही अलग है। इस पीठ के ही महंत लगातार 1989 से गोरखपुर का लोक सभा में प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं। यहाँ तक की पीठ और उसके महंत आस पास का कई विधान सभा और लोक सबह क्षेत्रों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं।

प्रदेश की राजनीति ने हर तरह के गठबंधन देखें और आजमाए हैं। कभी एकक्षत्र राज करने वाली कांग्रेस अब हाशिये पर जा चुकी है तो वहीँ कभी पिछड़ों और दलितों की आवाज बन सपा-बसपा ने जो सरकार बनायीं उसकी अंतिम संस्कार गेस्ट होसुए कांड के साये में हो गया। भाजपा ने भी बसपा सुप्रीमो मायावती को बहन बना कर एक प्रयोग किया लेकिन वो भी बहन जी की अति महत्वाकांछा की भेंट चढ़ गया।

तो क्या यह मान लिया जाए कि अब भाजपा इस प्रदेश में पूरी तरह से अपराजित हो चुकी है। क्या यह मान लिया जाये की चुनावी मैदान में कोई भी पार्टी भाजपा को तकार नहीं दे पाएगी। वर्तमान हालत में तो ऐसा ही लगता है। सोशल इंजीनियरिंग के जिस नए फॉर्मूले को अपनाकर भाजपा ने इतने वर्षों के वनवास के बाद जो सत्ता पायी है उसको तोडना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल तो लग ही रहा है।

राजनीति संभावनाओं का खेल है। यहाँ हमेशा 2+2=4 हो यह जरुरी नहीं है। इसलिए हो सकता है कि कल को कोई नया समीकरण बन जाए और भाजपा को सत्ता से बेदखल कर कोई अन्य पार्टी सरकार बना ले। लेकिन उस बात पर निगाह डालना जरुरी है कि वो समीकरण अब बनेगा कैसे! अगर भाजपा के अलावा प्रदेश में सक्रिय तीन अन्य मुख्य पार्टियों की बात की जाए तो कांग्रेस तो जो भी मजबूत होगा उसके साथ जाने को लगभग तैयार ही बैठी है। तो रह जाती हैं दो अन्य पार्टियां बसपा और सपा।

इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि वर्तमान भाजपा और उसके नए फॉर्मूले को चुनौती देने की क्षमता अकेले सपा और बसपा दोनों में नहीं है। मतलब अगर भाजपा को चुनौती देना है तो इन दोनों दलों को साथ आना होगा। लेकिन एक बड़ा सवाल है कि क्या गेस्ट हाउस कांड की कड़वी यादों को भूल मायावती अखिलेश से हाथ मिलायेंगी? बीते कुछ दिनों में अखिलेश ने अपनी तरफ से नरमी दिखा कर इस मामले में पहल तो कर दी है लेकिन अभी तक बहन जी की तरफ से इस सम्बन्ध में सफ़ेद झंडा नहीं दिखाया गया है। और यह भी एक तथ्य है कि गेस्ट हाउस काण्ड के रचयिता मुलायम सिंह यादव खुद हासिये पर जा चुके हैं। इसलिए हो सकता है की सपा में हुआ नेतृत्व परिवर्तन बहन जी के मन को परिवर्तित कर दे।

फिर से दोस्ती के मामले में एक और बड़ी रुकावट है कि यादव हर मामले में दलितों से सशक्त हैं। नीचे स्तर पर दोनों जातियों में बहुत मधुर सम्बन्ध कभी नहीं रहे। अखिलेश सरकार में यादवों की गुंडई किसी से छुपी नहीं है। यह अलग बात है कि समाज के निचले तबके को दबाने के लिए केवल सवर्णों को दोषी ठहराया जाता है जबकि सच यह है कि जब जब मौका मिला है यादवों ने भी दलितों पर जुल्म ढाहने में कोई कमी नहीं की है। कुशीनगर में सपा की सरकार बनते ही हरिजनों और यादव में संघर्ष हुआ था और इसमें कई दलित वर्ग के लोग घायल भी हुए थे। इस तरह के कई उदाहरण है जिसमे यादवों और दलितों के बीच संघर्ष हुआ है।

वैसे प्रदेश स्तर पर चाहे जो हो रहा है लेकिन मुख्यमंत्री के शहर गोरखपुर के दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय में कुछ ऐसा हो रहा है जो दोनों पार्टियों को एक बार फिर साथ लाने की ताकीद कर सकता है। जी हाँ यहाँ वर्षों से चले आ रहे सवर्णों के वर्चस्व को समाजवादी छात्र सभा और अम्बेडकरवादी संगठन ने ना केवल मिल कर चुनौती दी है बल्कि अपना झंडा भी गाड़ा है।

इस बाबत जब Gorakhpur Final Report ने जब गोरखपुर यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष अमन यादव से पूछा तो उनका कहना था कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद यूनिवर्सिटी में एक माहौल बना जिससे दलितों को लगा की वह सबको लेकर चल रहे हैं। धीरे-धीरे इस सोच ने भाईचारे का रूप ले लिया। उनका कहना था कि गठबंधन को लेकर तो दोनों पार्टियों के बड़े नेताओं को तय करना है कि क्या होगा और क्या नहीं लेकिन साम्प्रदायिक शक्तियों को रोकने के लिए दोनों पार्टी को एक होना चाहिए और दलित और पिछड़ा वर्ग भी यही चाहता है ।

कुल मिला यह कहा जा सकता है कि गोरखपुर यूनिवर्सिटी में यादव और दलित प्रेम की एक स्क्रिप्ट ठीक से लिखी जा रही है। इसको यूनिवर्सिटी के बीते चुनाव में आजमाया भी गया और सफलता भी मिली।

कभी गोरखपुर यूनिवर्सिटी के छात्रनेता रहे और अब मेरठ यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर दलित चिंतक हितेश सिंह बताते है की ब्राह्मणवाद का विरोध करने का मतलब यह नहीं है कि किसी जाति का विरोध करना बल्कि जबरदस्ती किसी बात को किसी के ऊपर थोपना ब्राह्मणवाद है और इसी का हम लोग विरोध करते हैं।
इस बात को स्वीकारते हुए कि जहाँ यादव सबल है और वहा भी दलितों पर जुर्म होता है हितेश सिंह कहते हैं कि उनको लगता है की यह समानांतर हो जाएंगे तो बराबरी करने लगेंगे।

वहीँ बहुजन समाज पार्टी के गोरखपुर प्रभारी ऋषि कपूर कहते हैं कि दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है। यह सही है दलितों कि पर अत्याचार हुआ है लेकिन उसको भुल कर सबको लेकर चलने की जरुरत है और लोगो को विकास की राजनीति पर बात करनी चाहिए ना की जातिगत राजनीति पर।

बहरहाल गोरखपुर में जो भी हो रहा हो फिलहाल अखिलेश और माया अभी अपना अपना नफा नुकसान तौलने में लगे हुए हैं। हालांकि जिस प्रकार गोराखपुर में गैर सवर्ण कार्यकर्ताओं को एक किया जा रहा है और यूनिवर्सिटी में सवर्णों के खिलाफ जिस तरह से जहर बोया जा रहा है उससे तो यही लगता है की लोहा गरम है और बस बड़े नेताओं को चोट करनी है।

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