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क्या उपचुनाव में तीन दशक से गिरते जनाधार को बढ़ाने में सफल हो पाएगी कांग्रेस!

क्या उपचुनाव में तीन दशक से गिरते जनाधार को बढ़ाने में सफल हो पाएगी कांग्रेस!

गोरखपुर: जिले की महत्वपूर्ण संसदीय सीट पर चुनाव होने हैं और इसके लिये देश मे कई दशक तक अपनी सत्ता चलाने वाली कांग्रेस ने उम्मीदवार भी घोषित कर दिया है। किंतु इसके विपरीत लगातार तीन दशक से इस सीट पर मतदान के मामले में जर्जर स्थिति का सामना कर रही कांग्रेस क्या इस चुनाव में अपना मत प्रतिशत बढा पाएगी,या फिर वही कुल मतदान प्रतिशत में अपने पुराने मत 4 से 5 फीसद के बीच मे ही सिमट कर रह जायेगी।

बता दें कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने का रुतबा रखने वाली कांग्रेस लगभग 5 दशक तक केंद्र में सत्तासीन रही। किन्तु चुनावी लड़ाई में इस पार्टी की वोटरों के बीच लोकप्रियता के पैमाने को देखें तो गोरखपुरलोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस हमेशा फेल होते ही दिखती है। अब, जबकि लगभग तीन दशक पूरे होने को हैं,बीता ऐसा कोई भी चुनाव नहीं रहा जब कांग्रेस ने गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र में अपनी जमानत बचा सकी हो।

वर्ष 1989 के चुनाव में इस दल के कब्जे से गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र एक बार छूटा तो फिर दोबारा यह पार्टी ठीक से जम नहीं पाई।अगर इस सीट पर कांग्रेस की लोकप्रियता का आंकलन किया जाए तो गोरखपुर से सांसद बनने का सम्मान आखिरी बार 1984 में कांग्रेसी प्रत्याशी मदन पांडेय ने बमुश्किल हासिल किया था। इसके बाद जितने भी चुनाव आये उसमे पार्टी के प्रत्याशियों को कभी तीसरे तो कभी चौथे स्थान पर करारी हार का ही सामना करना पड़ा।

एक नजर इस सीट पर बीते चुनावों में लड़ने वाले प्रत्याशी के मत प्रतिशत पर डालें तो वर्ष 1989 के चुनाव में मदन पांडेय को 12.86 मत मिले और तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 1991 में कोई भी प्रत्याशी खड़ा नहीं हुआ। फिर 1996 में हरिकेश बहादुर को 2.60 फीसद मत पाकर चौथा स्थान मिला, इसके बाद 1999 के चुनाव में डा. जमाल अहमद को 3.08 फिसद मत पाकर चौथा स्थान, वर्ष 2004 में शरदेंदु पांडेय को 4.85 प्रतिशत मत पाकर चौथा स्थान, फिर वर्ष 2009 में लालचंद निषाद को 4.04 प्रतिशत मत पर तीसरा स्थान और अंत मे बीते 2014 के चुनाव में अष्टभुजा प्रसाद त्रिपाठी को 4.39 फीसद मत पाकर चौथे स्थान पर ही सन्तोष करना पड़ा।

अब जबकि एक बार फिर उप चुनाव के बहाने गोरखपुर की जनता को अपना सांसद चुनना है तो ऐसी अवस्था मे सत्ता से मोहभंग कर चुकी कांग्रेस के पास न केवल अपनी खोई हुई सीट वापस पाने का मौका है, बल्कि सम्मानजनक लड़ाई लड़ने का अवसर भी है। हालांकि इसके लिए स्थानिय स्तर पर कांग्रेस की इकाई पदाधिकारियों ने जिले में कई मुद्दो पर जनहित की लड़ाई लड़ी है।जिनमे एम्स की स्थापना और मानबेला का जमीनी विवाद भी शामिल है।

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