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‘नो इफ़ नो बट, गोरखपुर में ओनली मठ’ वाली बात कितनी सही, कितनी गलत!

‘नो इफ़ नो बट, गोरखपुर में ओनली मठ’ वाली बात कितनी सही, कितनी गलत!

 
गोरखपुर: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गोरखपुर लोक सभा उपचुनाव में हार से इस बात को और और पुरजोर तरीके से कहा जा रहा है कि ‘गोरखपुर में रहना है तो योगी, योगी कहना है’। लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि ‘नो इफ़ नो बट, गोरखपुर में ओनली मठ।’ बात भी सही है आखिर गोरक्ष पीठ के ही दम पर पहले मंहत दिग्विजयनाथ, फिर महंत अवैद्यनाथ और फिर महंत योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर लोक सभा सीट पर अपना एकाधिकार जमाया। 1989 से 2014 तक तो लगातार एक दो बार छोटी मोटी चुनौतियों को छोड़ दिया जाए तो मठ के सामने कोई टिक भी नहीं पाया।

आलम यह था कि यहाँ मठ को भाजपा या किसी पार्टी की जरुरत नहीं थी, पार्टी को मठ की जरुरत थी। योगी आदित्यनाथ ने यहाँ हिन्दू महासभा के टिकट पर भी जीत दर्ज की है। महंत अवैद्यनाथ ने तो सबसे पहले हिन्दू महासभा के ही टिकट पर जीत दर्ज की थी। वो बात दीगर है कि भाजपा ने हर बार इस सीट पर मठ को अपना समर्थन दिया। इसी सीट पर अपने जबरदस्त रिकॉर्ड के कारण योगी भाजपा आलाकमान से कई अन्य सीटों पर बार्गेनिंग भी करते रहे हैं। आलम यह था कि गोरखपुर मंडल में पार्टी योगी के मन के विपरीत यदि किसी को टिकट दे देती थी तो उस नेता की हार तो सुनिश्चित हो ही जाती थी।

लेकिन पहले की बात और थी। अब योगी इस सूबे के मुखिया है। पहले वो एक ऐसे सांसद थे जिसकी सरकार न तो केंद्र में थी और ना ही राज्य में (बीच के कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाये तब)। तब उनकी जबाबदेही नहीं होती थी, अब तय हो रही है। वहीँ दूसरी तरफ आरएसएस उनमे भविष्य का प्रधानमंत्री भी देख रहा है। ऐसे में गोरखपुर की हार ने सबसे ज्यादा किसी की साख को बट्टा लगाया है तो वो योगी ही हैं। योगी ने अपनी तरफ से इस सीट को जीतने में कोई कोर कसर छोड़ी भी नहीं थी। लेकिन फिर भी शहरी मतदाताओं की उदासीनता के कारण भाजपा और योगी को गोरखपुर में हार का मुंह देखना पड़ा।

हार के बाद एक बार फिर यह बात उठने लगी है कि नो इफ़ नो बट, गोरखपुर में ओनली मठ। तो क्या यह मान लिया जाए कि इस हार में योगी की हार नहीं छुपी है। क्या योगी की प्रतिष्ठा इस उपचुनाव में दावं पर नहीं लगी थी! ऐसा नहीं है दावं पर थी। तो फिर नो इफ़ नो बट, गोरखपुर में ओनली मठ क्यों कहा जा रहा है इस बात को समझना होगा। एक राष्टीय दैनिक के पत्रकार और स्थानीय राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले अजय श्रीवास्तव बताते हैं कि उपेंद्र शुक्ला के अलावा यदि पार्टी मैदान में गोरखनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी कमलनाथ या फिर योगी का काम काज देखने वाले और मंदिर में सीएम के चेहरे द्वारिका तिवारी भी होते तो चुनाव का नतीजा कुछ ऐसा ही होता।

अजय कहते हैं कि जब बात मठ की होती है तो इसका मतलब यह नहीं होता है कि मंदिर का कोई पुजारी या पदाधिकारी बल्कि उसका अर्थ होता है कि ऐसा व्यक्ति जो सीधे तौर पर योगी से जुड़ा हो। या फिर वो जिससे लोग योगी का समझ कर भावनात्मक रूप से जुड़ सके। उपेंद्र शुक्ल के साथ ऐसा नहीं था। उपेंद्र योगी के गुड बुक में कभी भी नहीं रहे। चाहे सांसद पंकज चौधरी हो या वरिष्ठ नेता रमापति राम त्रिपाठी अथवा केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल,उपेंद्र के हर उस नेता से अच्छे सम्बन्ध हैं जिनका योगी से 36 का आंकड़ा है।

अजय कहते है कि यदि इस चुनाव में भी धर्मेंद्र सिंह या डॉ राव जैसा कोई व्यक्ति उमीदवार होता तो शायद परिणाम इसके उलट हो सकता था।

वहीँ गुआक्टा के पूर्व अध्यक्ष और गोरखपुर विश्वविद्यालय के शिक्षक राजेश मिश्रा ने तो नो इफ़ नो बट, गोरखपुर में ओनली मठ वाली बात को पूरी तरह नकार दिया। उनका भी मानना है कि इस चुनाव में योगी को छोड़ यदि मंदिर से भी कोई और भी होता तो परिणाम यही होता। उनका कहना है कि भले उपचुनाव में हार से योगी की साख को ठेस पंहुची है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि योगी से बड़ा व्यक्तित्व या नेता अभी भी गोरखपुर तो छोड़िये प्रदेश में कोई और नहीं है।

श्री मिश्रा का कहना है कि गोरखपुर की जनता बहुत प्रबुद्ध है और वो समय-समय पर इस बात का एहसास भी करा देती है। शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की ख़राब नीतियों के खिलाफ काफी मुखर रहने वाले राजेश मिश्रा का मानना है कि इसी गोरखपुर की जनता ने कभी तीन बार के विधायक शिव प्रताप शुक्ल को पटखनी दी थी। इसी गोरखपुर की जनता ने सभी को नकारते हुए एक किन्नर आशा देवी को मेयर बना दिया था। उन्होंने कहा कि इस चुनाव में भाजपा की हार केवल और केवल पार्टी के कोर वोटर के उदासीनता के कारण हुई है।

ब्राह्मण बनाम ठाकुर या मठ बनाम हाता वाली बात को भी पूरी तरह से नकारते हुए राजेश मिश्रा कहते हैं कि यह सही है कि ठाकुरों ने इस बार उस अनुपात में भाजपा को वोट नहीं दिया जैसा वो पहले देते थे। श्री मिश्रा कहते हैं कि पहले तो यह समझना होगा की ठाकुर वोटर गोरखपुर लोक सभा में बहुत निर्णायक स्थिति में नहीं है। फिर भी जिन्होंने नहीं दिया तो वो इस कारण नहीं की एक ब्राह्मण उम्मीदवार खड़ा है, बल्कि वो इस बात से उदासीन हो गए थे कि जैसा लाभ अखिलेश की सपा सरकार में यादवों को मिला था वैसा लाभ उन्हें अपने महाराज जी के सत्ता में रहते हुए नहीं मिल रहा है। श्री मिश्रा कहते हैं कि ठाकुर इतने मुर्ख नहीं हैं जो यह ना समझ सकें कि उपेंद्र शुक्ला से ज्यादा इस हार ने योगी की महत्वकांछाओं को ठेस पंहुचायी है। राजेश मिश्रा कहते हैं कि भाजपा की हार के बाद शहर के बहुत से मतदाता जो वोट देने नहीं गए वो दुखी भी हैं।

उनका कहना है कि मतदाताओं में यह बात घर कर गयी थी एक मेरे वोट ना देने से क्या फर्क पड़ेगा भाजपा तो जीत ही जाएगी। राजेश मिश्रा इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि कार्यकर्ताओं और आम वोटर की उदासीनता के कारण हार हुई है, ना कि किसी मठ के प्रत्याशी के ना होने से या हाता की अति सक्रियता से। वो कहते हैं कि यदि सरकार जमीन पर अपने कार्यों का मूल्यांकन ठीक से कर ले और उदासीन मतदाताओं को फिर से बूथ तक खींच लाये तो कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो भाजपा को 2019 में गोरखपुर से हरा दे।

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