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जंगल कौड़िया स्थित महामाया कर्म दुर्गा मंदिर: जहां दर्शन मात्र से ही पूरी हो जाती है मनोकामना

अरविन्द श्रीवास्तव
गोरखपुर: मुख्यालय से महज 19 किमी दूर जंगल कौड़िया विकास खण्ड कार्यालय के निकट स्थापित आदि शक्ति महामाया कर्म दुर्गा मंदिर के बारे में शायद ही कोई हिन्दू परिवार हो जो न जानता हो। जो भी इस मंदिर की चौखट पर आया और मत्था टेका उसकी मनोकामना ही नहीं उसके सारे दुख दर्द दूर हुए। ऐसा उस इलाके के लोगों की मान्यता है। मन्नत मांगने और मन्नत पूरा होने पर स्थानीय लोगों के अलावा नेपाल व बिहार तक से श्रद्वालु यहां आते हैं।

ऐसी जागता देवी मंदिर का इतिहास कोई बहुत पुराना भी नहीं है। इस मंदिर के स्थापत्य की कहानी अन्य मंदिरों से काफी भिन्न है। आम तौर पर मंदिरों की स्थापना स्थानीय राजे महाराजे, जमींदार, मनसबदार या ग्राम प्रधान के अलावा चंदे के बल पर कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा कराया जाता है। लेकिन इस मंदिर की स्थापना मंदिर के ही पुजारी द्वारा अपने दुर्दिन से मुक्ति पाने की गरज से कराई गयी थी।

बताया जाता है कि अपने तीन संतानों व कुछ जानवरों को खोने और आये दिन होने वाली दुर्घटनाओं से स्थानीय रामलाल विक्षिप्त हो चुका था। अपने दुर्दिन काल में उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। तभी उसे आधी रात को देवी मां स्वप्न में दिखाई दीं। उन्होने रामलाल से उस पुराने वायदे को याद दिलाया जो रामलाल की मां ने देवी मां को अपने दरवाजे के सामने ही मां का स्थान बनवाने का वचन दिया था। समय गुजरने के साथ ही रामलाल की मां भूल गयीं और अपने समय पर उन्होने शरीर भी छोड़ दिया। अलबत्ता उन्होने रामलाल से बातचीत में मां से किये गये वचन की बात दोहराई थी। लेकिन समय के साथ साथ रामलाल अपने परिवार के भरण पोषण में लग गया। उसे भी माता के मंदिर निर्माण की बात भूल सी गयी।

लेकिन लगातार आपदाओं व कष्टों ने जब उसे कहीं का नहीं छोड़ा और एक रात मां ने जब साक्षात्कार कर उसे नसीहत दी तो उसका दिमाग खुला और मुफलिसी के बावजूद उसने हिम्मत जुटाया और अपने घर के सामने ही उसने मां की स्थापना अगले ही दिन शुरू कर दी। जैसे जैसे मंदिर तैयार होता गया रामलाल की मुसीबतें भी दूर होती गयीं। 1985 में इस मंदिर की नींव की ईंट रखी गयी थी जो 1997 में बन कर पूरी तरह तैयार हो गया। तब तक लोगों में इस स्थान के प्रति इस कदर आसक्ति आ चुकी थी कि हर सोमवार को दूर दराज से बीमार व परेशान हाल लोग यहां अपनी मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए मत्था टेकना नहीं भूलते।

रामलाल अब पुजारी और सोखा हो गये। पुजारी रामलाल का जन्म 1 अप्रैल 1952 को अपने ननिहाल भौवापार में हुआ था। बताया जाता है कि रामलाल के जन्म के ही समय एक कन्या ने आकर उनकी माता से कहा कि यह बालक मां का भक्त बनेगा। यह कह कर उक्त कन्या अर्न्तध्यान हो गयी थी। उसी समय शिशु रामलाल की मां ने माता के सामने यह वचन दिया था कि अपने घर के सामने ही आपका स्थान बनवाउंगी लेकिन जब ऐसा नहीं हो सका तो रामलाल के परिवार पर आफत का पुलिंदा गिरने लगा था।

आदि शक्ति महामाया कर्म दुर्गा मंदिर , दिन बीतने के साथ ही लोगों की आस्था का केन्द्र बन चुका है। लोगों की मनोकामना पूर्ण होने लगी। प्रति वर्ष नवरात्र में दूर-दूर से माता के भक्त दर्शन करने आते हैं और धीरे-धीरे आस पास के लोग भी आने लगे पुजारी ने माता को सिद्ध कर लोगों को माता का प्रसाद देने लगे और लोगो का कल्याण होने लगा। तब फिर माता ने पुजारी को दर्शन दिया और मंदिर पर जनता के कल्याण का नियम बताया।

मौजूदा पुजारी ने बताया कि यहां पर कथा कीर्तन, रामायण, दुर्गापाठ, भागवत जागरण कराने से भी मनोकामना पूर्ण होती है। दुर्गेश मौर्या, वीरेन्द्र पांडेय, चंदशेखर, रमेश मौर्य, नौमीनाथ, संतोष मौर्या, रामचन्द्र यादव, रामदयाल यादव, रामाधीन, अर्जून तिवारी, मनोज मौर्या, रामेस्वर सिंह, शिवम, सत्यम वीरेंद्र पांडेय रमेश मौर्या, चंद्रशेखर आदि भक्तों ने मंदिर से सम्बंधित यह सारी बातें बताई।

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