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क्या है भारत रत्न से सम्मानित होने वाले नानाजी देशमुख का गोरखपुर से सम्बन्ध!

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, मशहूर संगीतकार भूपेन हजारिका और आरएसएस से जुड़े नेता एवं समाजसेवी नानाजी देशमुख को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जायेगा। शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन से जारी बयान में कहा गया कि नानाजी देशमुख एवं भूपेन हजारिका को यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया जाएगा।

11 अक्टूबर 1916 को जन्मे नानाजी देशमुख एक समाजसेवी थे। वे पूर्व में भारतीय जनसंघ के नेता थे। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तो उन्हें मोरारजी-मन्त्रिमण्डल में शामिल किया गया परन्तु उन्होंने यह कहकर कि 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग सरकार से बाहर रहकर समाज सेवा का कार्य करें, मन्त्री-पद ठुकरा दिया। वे जीवन पर्यन्त दीनदयाल शोध संस्थान के अन्तर्गत चलने वाले विविध प्रकल्पों के विस्तार हेतु कार्य करते रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। अटलजी के कार्यकाल में ही भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण स्वालम्बन के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिये पद्म विभूषण भी प्रदान किया।

क्या है भारत रत्न से सामनित होने वाले नानाजी देशमुख का गोरखपुर से सम्बन्ध!
‘भारत रत्न’ से सम्मानित होने वाले नानाजी देशमुख का गोरखपुर से बड़ा ही अनूठा सम्बन्ध रहा है। नानाजी देशमुख ने सबसे पहले देश में सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना गोरखपुर में ही की थी। नानाजी देशमुख त्याग, तपस्या की प्रतिमूर्ति थे। आरएसएस प्रचारक के रूप में पहली बार आगरा आये नानाजी की मुलाकात पंडित दीन दयाल उपाध्याय से हुई। वो उन्हें लेकर गोरखपुर आये।

नानाजी ने आरएसएस के प्रचारक के रूप में यूपी में बहुत योगदान दिया। उस समय आरएसएस की आर्थिक स्थिति काफी ख़राब थी। संघ के पास दैनिक खर्च के लिए भी पैसे नहीं होते थे। नानाजी को धर्मशाला में ठहरना पड़ता था लेकिन उस समय धर्मशालाओं का नियम था कि कोई भी व्यक्ति तीन दिन से ज्यादा एक ही धर्मशाल में नहीं ठहर सकता। नानाजी को हर तीसरे दिन धर्मशाला बदलनी पड़ती थी। अंत में बाबा राघवदास ने उन्हें इस शर्त पर ठहरने दिया कि अगर वे उनके लिए खाना बनाएंगे तो वे वहां ठहर सकते है।

नानाजी गोरखपुर में तीन साल तक ठहरे और संघ का प्रचार किया। उनकी तीन साल की मेहनत रंग लाई। गोरखपुर के आसपास उन्होंने संघ की ढाई सौ से अधिक शाखाए खुलवाई। लेकिन नानाजी ने इस समय शिक्षा पर बहुत जोर दिया। उन्होंने पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना गोरखपुर में की।

नानाजी की मृत्यु 2010 में 84 साल की उम्र में हुई थी। अपने जीवित रहते हुए उन्होंने देहदान का संकल्प लिया था। जिसे उनकी मौत के बाद पूरा किया गया।

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