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गोरखपुर उपचुनाव: संजय निषाद के बेटे हो सकते हैं सपा के उम्मीदवार, भाजपा अभी भी असमंजस में

गोरखपुर उपचुनाव

राकेश मिश्रा
गोरखपुर: सपा सदर लोकसभा सीट पर  गोरखपुर उपचुनाव की घोषणा हुए 9 दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक कांग्रेस को छोड़ किसी भी पार्टी ने अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। क्षेत्र के उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी चयन के मामले में यह दोनों पार्टियां अभी वेट एंड वॉच की राह पर हैं। चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन कांग्रेस ने प्रत्याशी घोषित करने के मामले में तो बाजी मार ही ली है। वहीँ एक और पार्टी सर्वोदय भारत पार्टी ने भी अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। सर्वोदय भारत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व IRS अधिकारी गिरीश नारायण पांडे ने तो अपना पर्चा भी दाखिल कर दिया है।

कांग्रेस ने शहर के मशहूर डॉक्टर सुरहिता करीम को अपना प्रत्याशी बनाया है। वहीँ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इन चुनावों (गोरखपुर और फूलपुर) में भाग नहीं ले रही है।

बात करें अगर समाजवादी पार्टी की तो वह इस चुनाव में बीजेपी की स्थायी सीट को एक बार पूरे दमखम से अपने कब्जे में लेने के लिए जातिगत मतों के आधार पर सर्वाधिक मतों वाले पिछड़ा वर्ग से प्रत्याशी चयन को लेकर उधेड़बुन में लगी है। किंतु यह भी सत्य है कि पार्टी बीजेपी के कैंडिडेट की राह जोह रही है,जिसे देख उसके मुकाबले का दंगली पहलवान उतारा जा सके।हालांकि पार्टी ने कमोबेश एक विकल्प तैयार भी कर लिया है।

प्रत्याशी को लेकर अभी तक किसी नाम पर अंतिम मुहर तो नहीं लगी है, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार इस चुनाव में किसी निषाद को पार्टी अपना उम्मीदवार बना सकती है। सपा ने गोरखपुर लोकसभा के सभी विधान सभा क्षेत्रों में सर्वाधिक मतदाताओं वाले मछुआरा समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी सजातीय नेता को अपना उम्मीदवार बनाने की सोची है। यदि विश्वस्त सूत्रों पर भरोसा जाए तो सपा निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ संजय निषाद के छोटे पुत्र व गोरखपुर उपचुनाव में निषाद पार्टी के लोकसभा प्रभारी सन्तोष निषाद को मैदान उतारने में उतारने का निर्णय ले चुकी है। सम्भावना है कि आज उनके उम्मीदवारी की घोषणा भी हो जाए।

इससे सपा के परम्परागत मत तो पार्टी के पक्ष में गिरेंगे ही,साथ मे पिछले चुनाव में बिखरे हुए निषाद मत भी साथ मे जुड़ जाएंगे। जिससे सपा भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को कड़ा टक्कर देने में सक्षम हो जाएगी।

क्या सोच रही है भाजपा

भाजपा के कट्टर विरोधियों को भी यह उम्मीद नहीं रही होगी कि जिस सीट पर भगवाधारी दलों का लगातार 34 साल तक शासन रहा वहां पार्टी एक जिताऊ उम्मीदवार खोजने में इतना समय लगा देगी। इसके पीछे क्या कारण है इसका तो अंदाजा पूरी तरह से नहीं लगाया जा सकता है। उम्मीदवार की घोषणा में देरी कारण तो गिनाये ही जा सकते हैं। पहला यह कि भाजपा भी सपा के उम्मीदवार को देख कर अपना फैसला लेना चाहती है। वहीं दूसरा सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के प्रभुत्व वाले इस सीट पर योगी के के मनपसंद और भरोसेमंद प्रत्याशी का ना मिलना।

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