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कैराना की तरह कुशीनगर के किसान भी हैं खफा, 2019 में बीजेपी की राह हो सकती है कठिन

मोहन राव
कुशीनगर: भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल कुशीनगर में सबसे जमीनी मुद्दा गन्ना है। गन्ना के किसानों की उपेक्षा यहां चुनाव प्रभावित करती है। जनपद में विपक्ष भाजपा को गन्ना किसान विरोधी बता रहा है। सूबे में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद लोगों को उम्मीद जगी थी कि गन्ना किसानों की समस्या का समाधान होगा। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह था कि योगी बहुत पहले से ही जनपद की इस जटिल समस्या से परिचित रहे हैं। सपा सरकार के समय कई बार उन्होंने गन्ना किसानों की समस्याएं उठाई थी।

प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद सरकारी फरमान भी आए कि बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान 14 दिन के अंदर दिया जाएगा। कुछ समय तक यह नियम चला भी। चीनी के दाम में लगातार गिरावट और गन्ने के सिरे की भी बिक्री न होने के कारण चीनी मिलों को होने वाली आय को प्रभावित कर दिया। इससे किसानों को बकाया गन्ने का मूल्य मिलना बंद हो गया। नतीजा आज दोराहे पर खड़ा किसान चीनी मिलों और सरकार दोनों को कोस रहा है।

बता दें कि जनपद में चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। जनपद की समस्त चीनी मिलों ने अपनी क्षमता से अधिक गन्ने की पेराई की है। नए किस्म के गन्ने आने से उत्पादन तो बढ़ा है साथ ही गन्ने का लागत मूल्य भी बढ़ा है। इस समय गन्ने की फसल में तमाम क्रियाएं होती हैं जिससे किसानों को धन की आवश्यकता पड़ती है। किसान अपनी गाढ़ी कमाई गन्ना मिलों को सप्लाई देकर उसकी भुगतान के लिए राह देख रहा है। केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार है लेकिन जनपद का एक भी जनप्रतिनिधि इस समस्या के समाधान के लिए आगे नहीं आ रहा है।

वहीं प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के जमीनी नेता इस मुद्दे को जनता के बीच रखकर सहानुभूति बटोर रहे हैं। भाजपा पर गन्ना किसान विरोधी होने का लेबल लगा रहे हैं । 2014 के लोकसभा चुनाव में स्वयं नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हमारी सरकार बनने के बाद पडरौना की चीनी मिल चलेगी। लेकिन 4 साल गुजर गए अड़चनें आती रही और मिल नहीं चल पाया। 2019 के चुनाव में भाजपा के लिए किसानों की समस्या का मुद्दा भारी पड़ सकता है और किसान एकजुट होकर के कैराना की राह पर चल सकते हैं।

शीरे की समस्या

चीनी उद्योग में चीनी के उत्पादन के साथ-साथ शीरा, बगाज और फ्रेशमड पैदा होता है। शीरे, बगास और फ्रेशमड की बिक्री कर मिल उससे भी अपनी आय बढ़ाते हैं। जिससे उन्हें कर्मचारियों की तनख्वाह और किसानों का बकाया देने में मदद मिलती थी। लेकिन वर्तमान में शीरा मूल्यहीन होने की वजह से शुगर मिलों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

एक शुगर मिल के मालिक ने बताया कि जो शीरा 300-400 रूपये प्रति कुंतल तक बिकता था आज उसका कोई खरीददार ही नहीं हैं। लिहाजा मिलों के पास शीरे का स्टॉक भरा हुआ है। सबसे अहम बात यह है कि यदि शीरे की बिक्री नहीं हुई तो अगले सीजन की भी पेराई सत्र प्रभावित होगी। क्योंकि शुगर मिल पहले से जमा शीरे का करेगा क्या।

शीरे का उपयोग डिस्टिलरियो, रासायनिक उद्योगों और ऐथेनाल बनाने में होता है। इस कार्य के लिए पूर्वांचल में गिनी-चुनी जो फैक्ट्रियां थी वह बंद हो गई। लिहाजा शीरे का अब कोई मूल्य नहीं रह गया है । इतना कीमती पदार्थ व्यवस्था सही ना होने से माटी के मोल बिकने को तैयार है। सरकार की पॉलिसी और सोच अच्छी रहे तो इस शीरे से इथेनॉल बनाकर दस से पंद्रह पर्सेंट तक पेट्रोल का विकल्प बनाया जा सकता है। साथ ही किसानों और शुगर मिलों की हालत भी सुधारी जा सकती है।

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