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पूर्वांचल में छात्र राजनीति के बदलते आयाम

डॉ अमित कुमार पांडेय

छात्र राजनीति निश्चित रूप से राजनीति की नर्सरी है। छात्र जीवन से राजनीति में आना कोई बुरी बात नही है। परन्तु इसमें होने वाले हिंसा या हिंसा जनित व्यवहार के लिए कोइ जगह नही होनी चाहिए। पूर्वांचल विशेषकर गोरखपुर मंडल की छात्र राजनीति से जुड़े कई सारे अच्छे और बुरे दौर से गुजर चुका है। जब भी कभी दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर के छात्र संघ चौराहे से गुजरते हुए दो प्रतिमाएं छात्र संघ भवन के सामने दिखती है तो छात्र राजनीति शब्द से नफरत सी हो जाती है।

राजनीति की यह प्राइमरी पाठशाला यदि गुंडे पैदा करने लगेंगे तो लोकतंत्र कब तक सलामत रहेगा, यह एक यक्ष प्रश्न बन जायेगा? आवेश में आकर नवयुवकों द्वारा उठाया गया एक कदम उनको जरायम की दुनिया का प्रोफेसर बना देती है। यूनिवर्सिटी और महाविद्यालय की शिक्षा व्यवस्था वैसे भी हासिये पर जा रही है। रही सही कसर यदि छात्र संघ चुनाव चुनाव पूरा कर देंगे तो हम किस भारत का निर्माण करने जा रहे है।

आज पूर्वांचल में हर दूसरा विद्यार्थी चुनाव लड़ने का सपना देख रहा है। परन्तु एक साक्षर नेता और बौद्धिक नेता के बीच का अंतर यदि हमारी युवा पीढ़ी नहीं समझ सकी तो यह चुनाव लड़ने और लड़ाने की प्रवृति इस पुरे समाज को बर्बाद कर सकती है। यदि छात्र राजनीति से इस तरह के परिणाम मिल रहे हो तो ऐसी राजनीति को प्रश्रय देना बंद कर देना चाहिए।

पूर्वांचल में छात्र राजनीति से निकल कर कई नेता ऐसे हुए जिहोने अपना लोहा राष्ट्रीय स्तर पर भी मनवाया। इस क्रम में उनका दामन हमेशा साफ सुथरा रहा। उन्होंने कभी भी किसी गलत कार्य के लिए ना तो प्रेरित हुए ना ही किसी को प्रेरित किया। आज परिवेश बदल चुका है। छात्र राजनीति राजनैतिक पार्टियों की कठपुतली बन चुकी है। इतनी गहमागहमी तो किसी विधायक के चुनाव में भी देखने को नहीं मिलता है। पैसों का नंगा प्रदर्शन, गाड़ियों का काफिला, नारेबाजी, खुलेआम गुंडागर्दी और शक्ति प्रदर्शन उम्मीदवार की दमदारी की निशानी बन चुकी है।

आलम यह है कि छात्र संघ चुनाव के नामांकन के दिन सामान्य लोग अपने घरों से निकलना तक नहीं चाहते। यदि जरुरी काम से निकल भी गए तो भूल कर उन रास्तों का रुख नहीं करते जहाँ नेताओं और उनके अंध समर्थकों की भीड़ इक्कठा होने वाली हो। नामांकन के दिन जाम न लगे तो फिर नेता बड़ा कैसे कहलायेगा। अगर लाठी, डंडा चल गया तब तो बहुत अच्छी बात है। बैठे बैठाये टीआरपी बढ़ जायेगी। धरना, प्रदर्शन का बहाना मिल जायेगा। क्यूंकि इन नेताओं के पास कोई अच्छा मुद्दा तो उठाने को है नहीं। विश्वविद्यालय या डिग्री कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएँ हैं अथवा नहीं, भला इन बातों से इन नेताओं का क्या लेना देना। इन्हे तो बस चुनाव में उतर जाना है। बाप, दादा या किसी आका का पैसा फूंकना ना है। जीत गए तब तो बन ही गए नेता। साल दो साल बाद फुर करेंगे सांसदी, विधायकी में दो-दो हाथ।

गोरखपुर यूनिवर्सिटी में लॉ फैकल्टी में हंगामे के बाद छात्र संघ चुनाव तो स्थगित हो गए हैं। वहीँ कुछ महाविद्यालयों में चुनाव या तो हो गए हैं या उससे सम्बंधित अधिसूचना जारी हो चुकी है। कुछ डिग्री कॉलेज में चुनाव करवाने के लिए छात्र नेता लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में पठन पाठन चुनाव की बलि ना चढ़ जाये इस बात की चिंता पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को सताए जा रही है। दूसरी तरफ मनचलो, मनबढ़ों और अलोकतांत्रिक किस्म के तथाकथित विद्यार्थियों के लिए यह उपयुक्त समय है जहाँ वो अपनी प्रतिभा को नंगा प्रदर्शन कर संके। प्रशासन भी इन हुल्लड़बाजों से परेशान है।

परन्तु बड़ा सवाल ये है की क्या सच में छात्र राजनीति से युवकों का विकास हो रहा है? कही ऐसा तो नहीं छात्र राजनीति राजनैतिक पार्टियों और क्षेत्रीय क्षत्रपों की चारागाह बनती जा रही है। बुद्धिजीवी वर्ग को इस पर विचार करना पड़ेगा। वरना शायद बहुत देर हो जाएगी। और फिर इतिहास उन्हें भी दोषी ठहराएगा जो आज हाथ पर हाथ रख कर तमाशा देख रहे हैं।

(लेखक नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं)

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