टॉप न्यूज़

DDU: क्या शिक्षक गुटों में वर्चस्व की लड़ाई, ABVP की हार का डर बना चुनाव स्थगन का कारण!

अरविन्द श्रीवास्तव/राकेश मिश्रा
गोरखपुर: दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर में 13 सितम्बर को होने वाले छात्र संघ चुनाव स्थगित हो गया है। यह खबर अब पुरानी हो गयी है। बड़ा सवाल यह है कि सीएम सिटी के गृहनगर के एक विश्वविद्यालय में एक छोटी सी घटना इतना दम रखती है कि चुनाव स्थगित हो जाए। प्रथम दृष्टया लगता तो ऐसा ही है। लेकिन जब हम इस बात की गहराई में जाते हैं तब तस्वीर कुछ और सामने आती है। यह घटना तो चुनाव टालने का एक जरिया भर बना। असल बात तो कुछ और है।

क्या है असल बात
चुनाव स्थगन का निर्णय आने के बाद से ही सोशल मीडिया पर विश्वविद्यालय प्रशासन, स्थानीय प्रशासन और यहाँ तक की सूबे की योगी आदित्यनाथ सरकार की भी जमकर खींचाई शुरू हो गयी। लगभग तीन गुटों में बंट चुके विश्वविद्यालय छात्र समाज के दो गुट ने तो चुनाव स्थगन को पूरी तरह से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) प्रत्यशी रंजीत सिंह के हार के डर से जोड़ दिया। इन लोगों का मानना है कि ABVP द्वारा एक आयातित प्रत्याशी को टिकट देने के बाद उसकी हार तय थी। ऐसे में सीएम सिटी के एक विश्वविद्यालय में भगवा संगठन की हार से होने वाली किरकिरी से बचने के लिए यूनिवर्सिटी को लॉ फैकल्टी में हुआ बवाल चुनाव टालने का एक जरिया बन गया और चुनाव टल गया। तो क्या यह माना जाए की केवल ABVP की हार का डर ही चुनाव टालने का कारण है। नहीं, यह पूरा सच नहीं है। पूरा सच जानने के लिए हमें मंगलवार को लॉ फैकल्टी में हुई घटना पर एक नजर फिर से डालना होगा।

क्या हुआ था लॉ फैकल्टी में
मंगलवार को आखिर लॉ फैकल्टी में हुआ क्या था। जानकारी के अनुसार मंगलवार को ABVP प्रत्याशी रंजीत सिंह अपने समर्थकों के साथ परिसर के लॉ फैकल्टी में चुनाव प्रचार के लिए पंहुचे। वहां उन्होंने विभाग के डीन के सामने लॉ फैकल्टी के अंतिम वर्ष के 250 छात्र, जिन्हे चुनाव में मतदान से वंचित कर दिया गया है, का मुद्दा रखा। उसके बाद छात्र नेता और उनके समर्थक नारेबाजी करने लगे। डीन ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। इतने पर नेता के समर्थक और भड़क गए। इसी बीच बचाव के लिए विभाग के ही दो अन्य शिक्षक आशीष शुक्ला और अभय मल्ल वहां पंहुच गए। नेता समर्थकों ने उनके साथ भी बदतमीजी की। कुर्सियां तोड़ कर शिक्षकों पर चलाया गया। गमले तोड़े गए। यह देख विधि विभाग के छात्र भी भड़क गए। उन्होंने नेता समर्थकों की जमकर धुनाई कर दी।

बाद में इसी घटना को लेकर दो छात्र गुटों के बीच भी झड़प हुई। घटना के विरोध में धरने पर बैठने जा रहे अध्यक्ष पद के प्रत्याशी अनिल दुबे और उनके समर्थकों पर पुलिस ने जमकर हाथ साफ़ किया। एक वायरल हो रहे वीडियो में तो साफ़ देखा जा सकता है कि किस तरह 8-10 बहादुर पुलिसकर्मी अकेले अनिल दुबे पर जमकर लाठी बरसा रहे हैं। सीएम सिटी के ये बहादुर पुलिसवाले जो एक अदना सा छात्र संघ चुनाव करा पाने में अक्षम हैं, वो छात्रों के एक मुट्ठी भर ग्रुप पर जमकर लाठी चलाने में कोई गुरेज नहीं करते। हाँ यह बात जरूर है कि धरने पर बैठने जा रहे अनिल दुबे के कुछ समर्थक उस समय यूनिवर्सिटी गेट पर उनके विरोधी की एक गाडी में तोड़ फोड़ कर अराजक माहौल पैदा कर रहे थे। लेकिन अगर स्थानीय प्रशासन इतने मुट्ठी भर लोगों को नहीं संभाल सकता है तो फिर उसके रहने और ना रहने का क्या औचित्य।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि चुनाव के ठीक दो दिन पहले ऐसी परिस्थिति आयी ही क्यों? लॉ फैकल्टी में जो हुआ क्या विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय प्रशासन ने उसकी तह में जाने की कोशिश की? क्या यूनिवर्सिटी प्रशासन ने लॉ फैकल्टी के गुनहगारों को चिन्हित कर कोई सजा निर्धारण की कोशिश की? यदि नहीं तो क्यों? शायद विश्वविद्यालय प्रशासन के पास लॉ फैकल्टी के गुनहगारों के खिलाफ कुछ करने की ना तो हिम्मत है, ना नियत। क्या कोई दबाव है जिसके कारण यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने एक छोटे से विवाद के बाद आनन-फानन में चुनाव स्थगित कराने का निर्णय ले लिया।

विश्वविद्यालय के ही एक एसोसिएट प्रोफेसर राजेश मिश्रा चुनाव स्थगन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अपने फेसबुक पेज पर लिखते हैं,”क्या दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर कैम्पस जहाँ 100 फीट का राष्ट्रीय तिरंगा लहराता है, वह अब श्रीनगर (जम्मू कश्मीर)का लाल चौक हो गया है? जहां 13 सितम्बर 2018 को होने वाले छात्र संघ चुनाव को अराजकता के कारण इस वर्ष के लिये स्थगित कर दिया गया है!”

लिंगदोह की सिफारिशों का हो रहा था खुला उल्लघन

केवल मंगलवार को ही नहीं बल्कि जब से चुनाव की घोषणा हुई थी तभी से छात्र नेता लिंगदोह कमिटी की सिफारिशों का खुलेआम उल्ल्घन करते रहे। पर्चा दाखिला के दिन तो पूरा विश्वविद्यालय ही बैनर और पोस्टर से पैट गया था। यूनिवर्सिटी की तरफ जाने वाली लगभग हर सड़क रंगीन हो चुकी थी। यही नहीं शहर के कई हिस्सों में भी बड़े-बड़े बैनर, पोस्टर लगाए गए। जानकारी के अनुसार यदि प्रत्याशियों का चुनाव खर्च 25 लाख तो पार कर ही गया होगा। अकेले बैनर, पोस्टर और पम्पलेट्स पर ही प्रत्याशियों ने लाखों खर्च कर दिए होंगे। बाकी चाय, नास्ता, पेट्रोल, गाडी के खर्च की तो कोई बात ही नहीं है।

लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को यह सब नजर नहीं आया। अगर नजर आ गया होता तो वो नहीं होता जो मंगलवार को लॉ फैकल्टी में हुआ। एक छात्र नेता को फैकल्टी में पोस्टर लगाने से रोका जाता है। सत्ता समर्थित नेता और उसके समर्थकों को यह रास नहीं आता है। फिर शिक्षा के मंदिर में एक अध्यापक को ही पीट दिया जाता है। बवाल होता है। दूसरे छात्र नेता भी बवाल में शामिल होते हैं। लाठीचार्ज होता है। चुनाव स्थगित हो जाता है।

चुनाव स्थगन की जगह होना तो यह चाहिए था कि जिन लोगों या नेताओं ने परिसर में लिंगदोह कमिटी की सिफारिशों का खुलेआम उल्ल्घन किया उन्हें चिन्हित कर यूनिवर्सिटी प्रशासन सीधा चुनाव लड़ने से ही रोक देता। ऐसा नहीं हुआ। यहाँ भी बड़ा सवाल क्यों नहीं हुआ? क्या सीएम सिटी में लोक सभा उपचुनाव में हार के बाद 2019 के आम चुनाव से पहले सत्ताधारी दल छात्र संघ चुनाव गवाने की कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था!

शिक्षकों के बीच वर्चस्व
कहा जा रहा है कि यदि मंगलवार वाली घटना लॉ फैकल्टी में ना होकर कहीं और हुई होती तो आनन-फानन में चुनाव स्थगन वाली बात नहीं हुई होती। लॉ फैकल्टी नामांकन वाले दिन से चर्चा में रहा। एलएलबी के अंतिम वर्ष के छात्र प्रणब द्विवेदी शुभम ने उपाध्यक्ष पद का पर्चा भरा टी उन्हें पता चला की उनका पर्चा ख़ारिज कर दिया जायेगा क्यूंकि विश्वविद्यालय प्रश्न ने प्रणब सहित 250 छात्रों को उनके मताधिकार से वंचित कर दिया था। मामले ने तूल पकड़ा। मंगलवार को लॉ फैकल्टी सुबह 9 बजे हुई थी। दिन में एक बजे के करीब लाठीचार्ज हुआ। इस बीच एसएसपी सहित पूरा जिला प्रशासन लॉ फैकल्टी पंहुच गया लेकिन यूनिवर्सिटी के प्रॉक्टर गोपाल प्रसाद को अपने ही विश्वविद्यालय के परिसर के लॉ फैकल्टी में जाने का टाइम नहीं मिला। आखिर क्यों? विश्वविद्यालय के आंतिरक व्यवस्था की जिम्मेदारी जिस व्यक्ति के ऊपर थी उसने वहां जाने की जहमत क्यों नहीं उठायी? इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि छात्रों की तरह विश्वविद्यालय में शिक्षकों के भी तीन गुट हैं।

क्या ABVP रंजीत सिंह को मैदान में उतार फंस चुकी थी

आज गोरखपुर में एक फेसबुक पेज बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। कड़वी गोली नाम का यह फेसबुक पेज डीडीयू चुनाव को लेकर खरी-खरी लिखने के कारण महानगर के तमाम युवाओं और छात्रों के बीच खासा लोकप्रिय है। यहाँ तक कि चुनाव प्रचार के दौरान जहाँ कहीं भी गोष्ठी या बैठक होती है, वहां कड़वी गोली की चर्चा जरूर होती है। यह पेज छात्र नेताओं के साथ-साथ विश्वविद्यालय प्रशासन को भी आईना दिखा रहा है। उसी पेज पर एक पोस्ट में आपको छात्र संघ चुनाव में ABVP समर्थित प्रत्याशी रंजीत सिंह की बहुत कुछ सच्चाई मिल जाएगी।

अगर आप उस पेज को देख लें तो आपको पता चल जायेगा कि रंजीत सिंह कैसे पहले कांग्रेसी से समाजवादी बनते हैं और फिर अंत में समाजवादी से राष्ट्रवादी। कड़वी गोली लिखता है कि असल में ABVP समाजवादी छात्रसभा का बी टीम हो गया है। उस पेज पर लिखा गया है कि ABVP ने अध्यक्ष पद का टिकट एक ऐसा छत्रनेता को दिया है जो किसी ज़माने में समाजवादी पार्टी के मंच से खुल कर भगवा संगठनों को गाली देता था।

यही नहीं रंजीत सिंह ने 2017 के विधान सभा चुनाव में जात के नाम पर कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे राणा राहुल सिंह को भी खुला समर्थन किया था। आखिर छात्र संगठन ABVP की ऐसी क्या मज़बूरी थी कि वो एक ऐसे व्यक्ति को छात्र संघ चुनाव में अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बना देता है जिसे शायद संगठन के ही इतिहास के बारे में कोई जानकारी न हो। क्या ABVP में कोई योग्य नेता ही नहीं था।

बता दें कि अनिल दुबे भी पहले ABVP के ही सदस्य थे। यह माना जा रहा था कि विद्यार्थी परिषद अनिल दुबे को ही मैदान में उतारेगी। लेकिन अंत समय में पता नहीं ऐसा क्या हो गया जो परिषद को रंजीत सिंह में एक योग्य उमीदवार की झलक दिख गयी। उन्हें मैदान में उतार दिया गया। रंजीत सिंह की उम्मीदवारी का खुला विरोध ABVP के कई सक्रिय कार्यकर्त्ता शुरुआत से ही कर रहे हैं। सक्रिय कार्यकर्त्ता अपने मन की बात को फेसबुक पर लिखने से भी नहीं कतरा रहे हैं। यहाँ तक कि जिस नेता कोर्णाक श्रीवास्तव ने ABVP को डीडीयू परिसर में एक नहीं पहचान दी वो अब अनिल दुबे के साथ खड़े हैं। कल की घटना में वो भी अनिल दुबे के साथ कैंट थाने में बैठाये गए थे।

अध्यक्ष पद की लड़ाई अनिल दुबे और अन्नू पासवान के बीच गयी थी सिमट!

यह बात किसी से छुपी नहीं है कि विश्वविद्यालय के अब तक के सभी चुनावों में पोलिंग जातिगत आधार पर ही हुए हैं। पहले जहाँ यह चुनाव ब्राह्मण और ठाकुरों के बीच सिमटी रहती थी वहीँ बीते एक दो चुनावों से पिछड़े और दलित छात्रों ने भी अपनी भूमिका दर्ज करानी शुरू कर दी है। जातिगत आधार पर बंटे इस विश्वविद्यालय में अब तीन ध्रुव–ब्राह्मण, ठाकुर और पिछड़ी-दलित जातियों के बन चुके हैं। अनिल दुबे को ब्राह्मण छात्रों का वोट तय माना जा रहा था तो वहीँ ठाकुर छात्रों की पहली पसंद ABVP उम्मीदवार रंजीत सिंह हैं।

समाजवादी छात्र सभा की प्रत्याशी अन्नू प्रसाद पिछड़ी और दलित जातियों का प्रतिनिधितव करती दिख रही हैं। लेकिन समीकरण इतना आसान नहीं है। जहाँ ABVP उम्मीदवार से रंजीत सिंह को मैदान में उतारने से संगठन के ही कई समर्पित कार्यकर्त्ता नाराज दिख रहे हैं वहीँ दलित नेता भास्कर चौधरी के मैदान में मजबूती से डटे रहने के कारण अन्नू प्रसाद की राह भी काँटों भरी दिख रही है। ऐसा माना जा रहा है कि लाल डिग्गी क्षेत्र में कई हॉस्टल में रहने वाले दलित छात्र पूरी तरह से भास्कर चौधरी के साथ हैं। एक और उम्मीदवार इंद्रेश यादव ने गायब रहने के बाद अन्नू प्रसाद को अपने समर्थन की घोषणा तो कर दी है लेकिन उनका पर्चा वापस नहीं हो पाया। ऐसे में कुछ वोटों में तो वो सेंध जरूर लगाएंगे। वहीँ अनिल दुबे के पक्ष में उनका विधि विभाग का छात्र होने के साथ-साथ ABVP का पुराण कार्यकर्त्ता होना भी जा रहा है। जानकारी के अनुसार छात्रावासियों के बीच भी अनिल दुबे पहली पसंद बताये जा रहे हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अध्यक्ष पद की लड़ाई अनिल दुबे और अन्नू प्रसाद के बीच सिमटी दिख रही है।

जानकारी के अनुसार भास्कर 11 सितम्बर की शाम अन्नू प्रसाद को समर्थन देने पर निर्णय लेने वाले थे। ऐसा माना जा रहा है कि भास्कर पर अन्नू प्रसाद को समर्थन देने का कई माध्यमों से दबाव बनाया जा रहा था। और इसी सम्बन्ध में भास्कर मंगलवार को कोई निर्णय लेने वाले थे। यदि भास्कर अन्नू प्रसाद को समर्थन दनी की घोषणा कर देते तो शायद छात्र संघ अध्यक्ष पद की लड़ाई एकतरफा ही हो जाती।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *