Uncategorized

अरुण गोविल : नहीं टूट रही राम वाली छवि (जन्मदिन विशेष)

Arun-Govilममता अग्रवाल
नई दिल्ली: रामानंद सागर के धारावाहिक ‘रामायण’ के राम यानी अरुण गोविल से कोई अनजान नहीं है। मर्यादा पुरुषोत्तम के किरदार को उन्होंने इस कदर जीवंत किया कि घर-घर में उनकी जगह बन गई, करोड़ों दिलों में अरुण की राम वाली छवि ही बसी है। मेरठ निवासी अरुण कहीं भी मिल जाएं तो बुजुर्गो के हाथ भी उनके आगे श्रद्धा से जुड़ जाते हैं।
राम का किरदार निभाना अरुण गोविल के लिए आसान न था। वर्ष 1986-1988 के बीच राम का किरदार निभाने के तीन वर्षो के दौरान उन्हें पर्दे के बाहर भी अपनी वही छवि बनाए रखने की कठिन चुनौती उनके साथ रही। यहां तक कि इस दौरान उन्हें वर्षो से पड़ी धूम्रपान की लत भी छोड़नी पड़ी।
किशोर अरुण गोविल ने स्कूल में मंचित हुए कई नाटकों में भाग लिया था, लेकिन अभिनय को अपना करियर बनाने के बारे में उन्होंने कभी सोचा भी न था। अपने व्यवसायी भाई के काम में हाथ बंटाने के लिए मुंबई आए थे, लेकिन जल्दी ही उन्हें अहसास हो कि वह व्यवसाय के लिए नहीं बने हैं, अभिनय ही उनकी मंजिल है।
मूल रूप से मेरठ निवासी अरुण गोविल का जन्म 12 जनवरी, 1958 को हुआ। वर्ष 1977 में ‘पहेली’ फिल्म से उन्होंने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। रामानंद सागर के राम के रूप में स्थापित होने से पहले वह उनके ही सीरियल ‘विक्रम और बेताल’ में बेताल को कंधे पर लादे राजा विक्रमादित्य की भूमिका में भी खूब सराहे गए।
उन्होंने ‘रामायण’ में राम के किरदार को इतने सार्थक ढंग से निभाया कि हर मन में उनकी वही छवि बस गई। लेकिन इससे पहले वह बड़े पर्दे पर भी सफलता का स्वाद चख चुके थे।
राजश्री प्रोडक्शन्स के ताराचंद बड़जात्या फिल्म ‘पहेली’ (1977) में उनके अभिनय से इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने गोविल को एक साथ तीन फिल्मों के लिए साइन कर लिया। इनमें से फिल्म ‘सावन को आने दो’ ने काफी धूम मचाई। इसमें उन्होंने जरीना वहाब के प्रेम में पड़े एक गांव के गायक छोरे की भूमिका निभाई।
उन्होंने ‘सावन को आने दो’, ‘सांच को आंच नहीं’, ‘इतनी सी बात’, ‘श्रद्धांजलि’, ‘हिम्मतवाला’, जैसी कई बॉलीवुड फिल्मों में अहम भूमिका निभाने के साथ ही भोजपुरी, उड़िया और तेलुगू में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी।
छोटे पर्दे पर उन्होंने ‘रामायण’ और ‘विक्रम बेताल’ के अलावा ‘लव कुश’, ‘कैसे कहूं’, ‘बसेरा’, ‘मशाल’, ‘बुद्ध’, ‘अपराजिता’, ‘अंतराल’, ‘कारावास’ जैसे कई सीरियलों में काम किया।
‘रामायण’ के राम के रूप में जहां उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता को साबित किया, वहीं उन्हें इसका खामियाजा भी उठाना पड़ा। उन्हें केवल ऐसी ही भूमिकाओं के प्रस्ताव मिलने लगे, मगर करीब 9-10 साल तक उन्होंने अभिनय दूर रहकर सिर्फ प्रोडक्शन का काम संभाला।
अपने सह-अभिनेता सुनील लाहिड़ी के साथ मिलकर उन्होंने अपनी एक टीवी कंपनी बनाई, जिसके तहत वह कार्यक्रमों के निर्माण से जुड़े रहे और इसमें उन्होंने मुख्य रूप से दूरदर्शन के लिए कार्यक्रम बनाए।
इसी दौरान उन्होंने दूरदर्शन के लिए वरिष्ठ नागरिकों के एक समूह के जीवन पर केंद्रित धारावाहिक ‘हैप्पी होम्स’ और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित धारावाहिक ‘मशाल’ का भी निर्माण किया।
भगवान राम और राजा विक्रमादित्य के किरदार को साकार करने वाले गोविल ने पिछले साल अगस्त में डीडी किसान चैनल के धारावाहिक ‘धरती की गोद में’ में एक दार्शनिक और मार्गदर्शक की भूमिका में छोटे पर्दे पर लंबे समय के बाद वापसी की।
वह केवल पर्दे पर ही राम बने रहकर संतुष्ट नहीं रहना चाहते, बल्कि वास्तविक जीवन में भी इस पौराणिक चरित्र के आदर्शो को उतारने के प्रयास में गोविल ब्रह्मऋषि श्री कुमार स्वामी के मार्गदर्शन में कुछ सामाजिक कार्यो से भी जुड़े हुए हैं।
हालांकि उन्होंने ‘माशूका’ (1987) में मुनमुन सेन के साथ एक कामुक बारिश गीत में भी अभिनय किया और टीवी श्रृंखला ‘कारावास’ में एक नकारात्मक भूमिका निभाई है, लेकिन वह भगवान राम की छवि से कभी बाहर नहीं निकल पाए।
भले ही ‘रामायण’ को लगभग तीन दशक हो गए हों, पर अरुण गोविल आज भी टीवी के राम के रूप में ही पहचाने जाते हैं।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *