उत्तर प्रदेश

जानिये उस शख्सियत को जिसके नाते अखिलेश, मायावती जैसों को खाली करना पड़ा सरकारी बँगला

राकेश मिश्रा
लखनऊ: प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों का सरकारी बंगला खाली करने का मुद्दा अभी भी चर्चा में है। हो भी क्यों ना, इन ताकतवर पूर्व मुख्यमंत्रियों ने बीते कई वर्षों से सूबे की राजधानी लखनऊ में सरकारी बंगलों पर कब्ज़ा जमाया हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने यूपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला खाली करने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस कानून को रद्द कर दिया था जिसमें पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगला देने का प्रावधान दिया गया था, और नया कानून पारित करते हुए कहा था कि प्रदेश का कोई भी पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी बंगले में रहने का हकदार नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद कुछ पूर्व मुख्यमंत्री जैसे राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह आदि तुरंत बंगला खाली करने को राजी हो गए तो वहीँ बड़ी मुश्किल और विवाद के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मायावती ने अपने सरकारी बंगलों को खाली किया। एक और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने तो बंगला ना खाली करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा फिर से खटखटाया। खैर वहां से राहत ना मिलने पर इन्होने सरकारी बंगला खाली करने का निर्णय लिया।

अब ये तो रही इन माननीयों की बात। अब उस व्यक्ति की बात करते हैं जिसके कारण इन सभी ताकतवर राजनीतिज्ञों को वर्षों से कब्ज़ा जमाये हुए बंगलों को खाली करना पड़ा। जी हाँ वो शख्श हैं पूर्व आईएएस अधिकारी सत्य नारायण शुक्ला। ये 75 वर्ष के एसएन शुक्ला की याचिका का ही नतीजा था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपना सरकारी बँगला खाली करना पड़ा। ये पहला मौका नहीं था, जब शुक्ला जी ने अपनी याचिकाओं के बूते ताकतवर सत्ता को हिलाया हो। इससे पहले भी उन्होंने कई बड़े फैसलों को पलटा था। अपने आईएएस करियर के दौरान उन्होंने कई बड़े पीडब्लूडी, एक्साइज, राजस्व, सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले।

बता दें कि साल 2015 में एनजीओ लोक प्रहरी ने अदालत में चुनावों के दौरान नेताओं की पत्नियों और संबंधियों की संपत्ति के स्त्रोतों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की थी।

एनजीओ ने 2016 में अपने जनरल सेक्रेटरी श्री शुक्ला के माध्यम से तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार द्वारा ‘UP Ministers (Salaries, Allowances and Miscellaneous Provisions) Act, 1981’ में संशोधन के खिलाफ याचिका दायर की थी। एनजीओ ने UP law of 2016 called ‘The Allotment of Houses under Control of the Estate Department Bill-2016’ को भी चुनौती दी थी।

अग्रेंजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए साक्षात्कार में श्री शुक्ला ने कहा था कि पब्लिक प्रॉपर्टी के रखवाले के नाते मुख्यमंत्री को इस बात का हक़ नहीं कि वो कुर्सी से उतरने के बाद भी इन सरकारी बंगलों का उपयोग करे। श्री शुक्ला ने बताया कि यह हमारी पहली याचिका थी। उन्होंने कहा कि हम सौभाग्यशाली हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने हमारे पक्ष में निर्णय दिया।

श्री शुक्ला कहते हैं कि न्याय मिलने में देर तो हुई, लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद। वो बताते हैं एनजीओ लोक प्रहरी केवल राष्ट्रीय और प्रादेशिक महत्व के विषयों को उठाता है। उन्होंने बताया कि संयोग से हमारी पहली याचिका सरकारी बंगलों से ही सम्बंधित थी। श्री शुक्ल बताते हैं कि 1996 में विधान सभा के तत्कालीन सचिव डीएन मित्तल ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्रियों के द्वारा सरकारी बंगलों पर कब्ज़ा जमाये रहने के खिलाफ एक याचिका दाखिल की थी। उन्होंने बताया कि तब की सरकार ने 1997 में एक कार्यकारी आदेश पारित कर दिया था। इस आदेश को भी हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में चुनौती दी गयी थी।

2004 में लोक प्रहरी ने इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। यह याचिका 12 वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। इस सम्बन्ध में 2016 में पहला आदेश आया। दूसरा आदेश बीते 7 मई को आया जिसके कारण इन पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपना बँगला खाली करने को मजबूर होना पड़ा।

श्री शुक्ला नौकरी से 2003 में रिटायर हुए। उसके बाद वो एनजीओ लोक प्रहरी से जुड़ गए। यह एनजीओ कुछ पूर्व आईएएस अधिकारियों, जज और दूसरे सरकारी अधिकारियों ने मिलकर स्थापित किया था। इस एनजीओ में पूर्व इलेक्शन कमिश्नर और गुजरात के गर्वनर आर के त्रिवेदी, पू्र्व डीजीपी और यूपीएससी के चेयरमैन रहे जेएन चतुर्वेदी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज एसएन सहाय भी हैं।

आपको बता दें कि इसी एनजीओ ने 2013 में अदालत में दोषी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्हीं की मुहिम का असर था कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि सज़ायाफ्ता सांसद या विधायक सजा की तारीख से पद पर रहने के अयोग्य होंगे। इसके बाद NGO ने रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट 1951 को अदालत में चुनौती दी। इसका असर हुआ कि कोर्ट ने दोषी व्यक्ति के वोट देने पर प्रतिबंध और ऑफिस जाने पर रोक लगा दी।

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